बिहारी के इस दोहे में है भयंकर गर्मी का वर्णन

बिहारी के इस दोहे में है भयंकर गर्मी का वर्णन

बिहारी के इस दोहे में है भयंकर गर्मी का वर्णन

बैठि रही अति सघन बन, पैठि सदन-तन माँह।
देखि दुपहरी जेठ की, छाँहौं चाहति छाँह ॥
~बिहारी

व्याख्या:- बिहारी ने प्रत्यक्ष रूप से तो जेठ की दुपहरी और ग्रीष्म की भयंकरता का वर्णन किया है, किंतु एक दूसरा संकेत भी है। जेठ की भीषण दुपहरी को देखकर एक नायिका नायक से कह रही है कि तुम इस भयानक गर्मी में कहीं मत जाओ। घर में ही रहो। वह कहती है कि देखो न, जेठ के महीने में इतनी गर्मी पड़ रही है कि छाया भी छाया चाह रही है अर्थात् छाया कहीं है ही नहीं मानों वह भी अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए किसी दूसरी छाया के नीचे छिप जाना चाहती है। यह एकांत-मिलन का सुंदर अवसर है। ऐसा अवसर बार-बार नहीं मिलता है। नायिका यह कहकर व्यंजित कर रही है कि इस अवसर का सदुपयोग कर लो अन्यथा पश्चाताप होगा।

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