जिन्दगी धूप-छाँव

जिन्दगी धूप-छाँव

जिन्दगी धूप-छाँव

"जिंदगी धूप-छाँव"

सोचूँ कुछ होता है कुछ,
बनी जिंदगी धूप छाँव ।
मैं कोशिश करता ही रहा,
नहीं चली रेत में नाँव ।
तपते सूरज को थाम हाथ में,
न जले किसी का पाँव।
शहर का हमशक़्ल हो,
मेरे भारत का गाँव ।
बदलूँ गरीब की किस्मत मैं,
पर चले न चलता दाँव।
सोचूँ कुछ होता है कुछ,
बनी जिंदगी धूप छाँव ।

अक़्ल का हमशक़्ल हूँ,
वक्त से कोसों दूर ।
हाथ जोड़कर खड़ा रहा,
पाने को कोहिनूर ।
लोग कोयले की खदानों से,
मालदार हुए हजूर।
मैंनें सच का पुतला थामकर,
उसे समझा जन्नत हूर ।
सब पीठ ठोक कर कह रहे,
कहाँ चरण-कमल से पाँव ।
सोचूँ कुछ होता है कुछ,
बनी जिंदगी धूप छाँव ।