स्त्री एक आश्चर्य एक ऐसा चरित्र जिसे पुरुष तो दूर देवता भी नहीं समझ सकते

स्त्री एक आश्चर्य एक ऐसा चरित्र जिसे पुरुष तो दूर देवता भी नहीं समझ सकते

स्त्री एक आश्चर्य एक ऐसा चरित्र जिसे पुरुष तो दूर देवता भी नहीं समझ सकते

स्त्री
एक आश्चर्य
एक ऐसा चरित्र
जिसे पुरुष तो दूर
देवता भी नहीं समझ सकते
ऐसा कहीं लिखा गया है।
मुझे लगता है उसे समझने की
कोशिश करना बेकार है
क्योंकि बुद्धि उसके पास भी है,
पर वह हृदय से सोचती है।
वह तर्क भी दिमाग से नहीं,
अनुभव के आधार पर करती है।
वह नमक,शक्कर भी नाप के नहीं,
अंदाज़े से सटीक डाल सकती है ।
उसके सारे हिसाब-किताब जोड़,
घटाने, गुणा भाग से नहीं होते,
आवश्यकता और ज़रुरत से चलते हैं ।
वही है जो अपने शरीर को सजा तो लेती है,
पर उसे संभालने को समय तक नहीं देती।
रोना उसकी कमज़ोरी नहीं है, ताकत है,
क्योंकि कठोर बनकर वह कभी
संबंधों को तोड़ना नहीं चाहती।
स्त्री सचमुच समझ से परे की रचना है,
उसे महसूस कर सको तो शायद
थोड़ा बहुत समझ लोगे
वरना तो शरीर से ही पहचानकर
उसे स्त्री कहा जा सकता है।
सच यही है कि मन से, हृदय से तो
सबमें थोड़ी -थोड़ी समाई ही रहती है ,
आखि़र नौ महीने तक भला कौन है
इस अनंत ब्रह्मांड में,
जो सृष्टि की रचना अपने भीतर कर सके,
एकमात्र वही है जो ईश्वर की इच्छा को
चरितार्थ कर सकती है।
शायद यही कारण है कि
स्त्री ईश्वर की खोज में
घर त्यागकर बाहर नहीं भटकती
बल्कि ईश्वर स्त्री के माध्यम से
स्वयं का परिचय कराने
धरा पर आते हैं
मुझे तो कुछ ऐसा ही लगता है...