शायरी का इंक़लाब

शायरी का इंक़लाब

शायरी का इंक़लाब

एक दिन अकस्मात
एक पुराने मित्र से
हो गई मुलाक़ात
कहने लगे- \"जो लोग
कविता को कैश कर रहे है
वे ऐश कर रहे हैं
लिखने वाले मौन है
श्रोता तो यह देखता है
कि पढ़ने वाला कौन है
लोग-बाग
चार-ग़ज़लें
और दो लोक गीत चुराकर
अपने नाम से सुना रहे हैं
भगवान ने उन्हें ख़ूबसूरत बनाया है
वे ज़माने को
बेवकूफ़ बना रहे हैं
सूरत और सुर ठीक हो
तो कविता लाजवाब है
यही शायरी का इंक़लाब है
उर्दू का रिजेक्टेड माल
हिन्दी में चल रहा है
चोरों के भरोसे
ख़ानदान पल रहा है
ग़ज़ल किसी की
फ़सल किसी की
भला किसी का\"

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